![]() Iss Baar ( Hindi)A Poem by hardeep sabharwal
इस बार
इस बार जब उड़न-तश्तरीया आऐ-ीं, तो वो हों-ी हैरान देखकर, यहां वहां ™-ी आ- को, "र कहे-ीं ™-ानी ही है अ-र आ- "र ज™ाना ही है जरूरी कुछ तो ज™ा दो ये जात-पात, उठा कर फेंक दो कहीं दूर आरक्षण की इन बैसाखीयों को ज™ा दो इनकी हो™ी, मिटा दो ये मज़हब ये धर्म सारे बांट रहे है रोकते है ,इसांनो को इसांन रहने से , चुने जाते है जहां नेता धर्म "र जाति के नाम पर, हटा दो ये व्यव्सथा , घटा दो ये मानसिकता , हजारो सा™ो से आऐ हो करते यूद्ध वर्ण "र रं- देखकर जिता दो अबके बार , एक बार मानव मात्र को , इस बार जब उड़न-तश्तरीयां आऐ-ीं तो वो ही पूछे-ीं क्योकिं इंसान तो इंसानो की वहशियत देख कर , ना हैरान होता है , ना पूछता है कुछ ? © 2016 hardeep sabharwalReviews
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1 Review Added on February 21, 2016 Last Updated on February 21, 2016 Author![]() hardeep sabharwalpatiala , punjab , IndiaAboutHardeep Sabharwal describes himself as person of few words. He is one of millions of middle class Indians who do not have any ideology; they only want to live a peaceful life. The thing that hurts him.. more..Writing
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